
जन्म हुआ जीवन का मेरे
घर-आँगन में गूंजी किलकारी थी
था खुश बहुत मैं पेट में माँ के
अब रोने की मेरी बारी थी

रोया भी था खूब मैं उस दिन
पर इक आँसू भी ना बहाया था
छोटा था शायद तब बहुत मैं
दर्द को ढ़ंग से समझ ही ना पाया था
गुज़रा बचपन चन्द बरसों में
दूर हुआ माँ का आँचल था
लगनी थी अब तो नज़र दुनिया की
बचाने को भी कहाँ उसका वो काजल था
जीवन है एक संघर्ष समझ
हर चुनौती मैंने स्वीकार किया
जीता तो सब मेरे अपने थे
हारा तो खुद को भी हार गया
रूख़सत होते गये सपने सारे
अल्हड़ जवानी यूँ ही गुज़र जाएगी
फूट कर रो लेने दो आज मुझे
कल तो ये आँख भी धोखा दे जाएगी
फिर थम गयीं साँसे मेरी एक दिन
पर कुछ हाथ ना मेरे आया था
दर्द लपेटे सोया था मैं
रोने भी कोई ना आया था
उजाले में सब दिखते अपने
छलिया बन हर किसी ने मुझको लुटा था
खो दिया सब पा कर मैंने
ढ़लते सूरज संग अब मैं अकेला था
दर्द तो मेरा अपना था
उसको भी मुझसे छीन लिया
जला कर राख तो कर देते ए ज़ालिम
मुर्दा मुझको क्यों छोड़ा था
जन्म लिया जीवन ने फिर से
घर-आँगन में गूंजी वही किलकारी थी
छोड़ दो मुझे ऐ दुनिया वालों
मेरी वो लाश अब भी जलनी बाकी थी
मैं रोता रहा सब हँसते रहे
लाचारी को मेरी सब खुशी समझते रहे
घुट-घुट कर चीखों ने मेरी दम अपना यूँ तोड़ दिया
ऐ दुनिया वालों अब मैंबे भी जीना सीख लिया
ऐ दुनिया वालों अब मैंने भी जीना सीख लिया
लोग कहते हैं ज़िन्दगी इतनी बड़ी है कि इसे झेल पाना बहुत मुश्किल है, मैं कहता हूँ ज़िन्दगी इतनी छोटी है कि इसे समझ पाना नामुमकिन है । हर रास्ता यहाँ किसी ना किसी मंज़िल को जाता है पर इन रास्तों पर चलते हुए सबको मंज़िल नसीब नहीं होती । मंज़िल मेरी भी किस्मत में ना थी लेकिन ये रास्ते मेरे अपने हो गये, इन पर चलते हुए मैंने जीवन की हर एक सुबह हर एक शाम की, इन पर ही चलते हुए मैंने हर रिश्तों की पहचान की, हारते-जीतते इन पर ही मैंने जीवन की आखिरी साँस गिनी । अब ज़िन्दगी से फिर से मिलने आया हूँ, जो जीवन जी ना सका था पहले जीने उसको मैं आया हूँ।
